अतीत यात्रा 3


क्या वाकई में धार्मिक ग्रन्थ ईश्वरीय हो सकते हैं?

आस्था के चलते आप कुछ भी मान सकते हैं, उसपे कोई रोक नहीं है लेकिन जमीनी सच यह है कि ईश्वरीय आस्मानी जैसा कुछ नहीं होता.. न तनख न कुरान न वेद। सबकुछ यहीं के लोगों ने लिखा है और ऐसा भी नहीं कि इन्हें इनके एक्चुअल वक्त में लिखा गया। कुरान फिर कुछ ही साल बाद लिख लिया गया क्योंकि तब कागज मौजूद था लेकिन बाकी सारे ग्रंथ सैकड़ों हजारों साल बाद लिखे गये। सवाल यह है कि तब तक याद कैसे रखे गये.. तो जवाब है कि उस दौर में गीतों/कविताओं के रूप में बातों को तराशा और बांधा जाता था और गाते हुए याद रखा जाता था। इस तरह से इतने बड़े-बड़े ग्रंथ जबानी परंपरा से सफर करते दूसरे माध्यमों और फिर कागजों तक पहुंचे।

अब कोई यह कहे कि सब कुछ जूं का तूं और क्रोनोलाॅजिकल क्रम में अपरिवर्तित रूप में पहुंचा है तो बस यह उसकी आस्था है.. ऐसा बिलकुल नहीं है। इंसानी क्षमताओं की एक सीमा है और उससे बाहर कोई नहीं। अब फिलहाल भारत का इतिहास परख रहे हैं तो बाकियों को छोड़ सिर्फ वेदों पर फोकस करते हैं। यह कब अस्तित्व में आये.. इस सवाल पर जाते ही आस्थागत व्यक्ति इन्हें इंसानी विकास के शुरुआती दौर में भी पहुंचा सकता है लेकिन इनमें मौजूद कंटेंट की बारीक खुर्दबीनी से इनके कालखंड के विषय में एक मोटा-मोटा अंदाजा तो लगाया जा सकता है।
3000-2500 ईसापूर्व ब्रोंज एज में ऋग्वेद और सामवेद की रचना हुई हो सकती है और यह वह वक्त था जब संगठित होते भारतीय समाज पर ब्राहमण वर्ग का प्रभुत्व था और इस काल को ही सतयुग के रूप में भी परिभाषित किया गया है। इस दौर में मिस्र में राजवंशों का विकास हुआ था। इसके बाद 2500-2000 ईसापूर्व में यजुर्वेद की रचना हुई.. इस काल को त्रेता कहा गया है और रामायण में वर्णित घटना को इसी समय में बताया जाता है। आसपास की दुनिया में मिस्र के पुराने राज्य का अंत हुआ था, ग्रीस की तरफ पूर्व मिनाओन काल का अंत हुआ था और सुमेरियन पुनर्जागरण की शुरुआत हुई थी।

जबकि 2000 से 1500 ईसापूर्व के बीच अथर्ववेद की रचना हुई और इसी दौर में महाभारत का युद्ध बताया जाता है, इसे द्वापर काल कहा गया। इसी काल में भारत की तमामतर जातियों के बीच अंतर्भुक्तिकरण की शुरुआत हुई। आसपास की दुनिया में मिस्र की तरफ हाइक्सस और आगे नया राज्य स्थापित हुए, ग्रीक की तरफ परवर्ती मिनाओन काल रहा, एशिया माइनर में असीरिया के असुरों (गरुड़मुखी देवता के उपासक) का राज्य हुआ, बेबीलोनियन राज्य असीरियनों के आधीन हुआ, फिर खुद स्थापित हुआ, आर्य ग्रीस की तरफ गये और इज्राएल की नींव पड़ी।
अब एक खास प्वाइंट.. हारून अल रशीद के दरबार में मलिक-उस-शअ'रा नाम का एक कवि था जिसने इस्लाम की मक्का विजय से पहले वहां से हटाये गये प्राचीन साहित्य को सहेजा था.. चाहे मितन्नी की संधि की तरह वे किसी भी माध्यम पर हों। उसने उनमें से कुछ रचनायें सम्पादित करके 'सियारुल' नाम का संग्रह बनाया था जो बाद में बैरूत पब्लिशिंग कंपनी फिलिस्तीन से छपा भी। इस किताब के 118वें पेज पर ईसा से 1700 वर्ष पूर्व हुए एक अरबी कवि लावी बिन-अख्तब-बिन-तुफी की एक कविता उद्धत की गयी है जो इस तरह है..

Faar aadakal gaaho nazzelaa zikratyn wahal tajalleeyatun 'ainaane sahabee arba 'atu;
Haazahee yunazzelv vasoolo Zikratun minal hindtun yagoolunallaa yaa ahalaal arze 'aalameena kullahum;
Fattabe 'oo Zikratul Veda haqqan maalam yunazzelatun wahowa 'aalum us samawal yujra minallahe tenzuelan Fa 'ainamaa yaa akheeyo muttabe 'au yo basshaveeyo naag atun.
Wa asnaina hymaa bik wa Atar naasaheena ka akhwatun.
Wa asnaata alaa 'oodan wahowa masha avatun.

तू धन्य है ओ हिंद की धरती, तू सम्मान के योग्य है क्योंकि तुझमें ईश्वर ने अपना असली ज्ञान प्रकाशित किया। ऊषा के आलोक के समान इन चार प्रकट पुस्तकों से कैसा पवित्र प्रकाश निकल कर हमारी आंखों को प्रसन्न करता है, इन चारों को ईश्वर ने अपने पैगम्बरों को हिंद में प्रकट किया। और 'वह' इस प्रकार 'उसको' पृथ्वी पर रहने वाली हर जाति को उपदेश देता है क्योंकि निश्चय ही परमात्मा ने उन्हें प्रकट किया है। वे खजाने साम और यजुस् (यज्रु-यजुर) हैं, जिन्हें परमात्मा ने प्रकट किया है.. हे मेरे भाइयो, उनका सम्मान करो क्योंकि वे हमें मुक्ति का संदेश देते हैं। बाकी दो इनमें से ऋक् और अथर्व (अतर) हैं जो भाइचारे का पाठ सिखाते हैं.. यह दो (वेद) हमें सावधान करने वाले प्रकाश हैं जो हमें उस लक्ष्य की ओर जाने का इशारा करते हैं।
कुरान सी शब्दावली लगी न.. लेकिन यह उससे बहुत पहले की और तब की है जब सेमेटिक लिटरेचर का नामोनिशान तक नहीं था और सभी ईश्वरीय किताबों की टोन यही मिलेगी। यहां कवि चारों वेदों के बारे में बता रहा है जो हिंद में प्रकट हुए। अब अरब में होते वेदों के इस स्तुतिगान से हमें कुछ बातें पता चलती हैं.. कि इस भूभाग को 'हिंद' के नाम से तब भी पुकारते थे, दूसरे उसके टाईम तक चारों वेद वजूद में आ चुके थे और उस दौर में भी अरब के लोग भारत के बारे में और यहां के समाज के बारे में जानते थे। तब समुद्री रास्ते व्यापार के चलते भी मेलमिलाप होता रहता था जिसके बड़े केंद्र आगे डेविड और सोलोमन ने इज्राएल में बसाये थे और दूसरे जमीनी रास्तों से भी इधर-उधर खिसकती आबादियों के बीच संवाद होता था।

लावी के करीब दो सौ साल बाद उत्तरी सीरिया में (ईराक, तुर्की और सीरिया के आंशिक भूभाग मिला कर) मितन्नी नाम का एक राज्य हुआ करता था। संस्कृत भाषा और संस्कृति को ठीक भारत की तरह आप यहां भी पा सकते हैं, इनके राजाओं, सामंतों, राजधानी (वसुखन्नी) के नाम संस्कृत में मिलेंगे, यह भारतियों, मिस्रियों की तरह युद्ध में रथ इस्तेमाल करते थे, संस्कृत में घोड़ों की ट्रेनिंग पर ग्रंथ लिख रखे थे और इन्होंने 1380 ईसापूर्व एक प्रतिद्वंद्वी राजा के साथ की संधि में इंद्र, मित्र, नासत्य (अश्विनी कुमार) जैसे वैदिक देवताओं को साक्षी बनाया था। अब यहां संस्कृत से सीधा अर्थ भारत की दी हुई भाषा से मत लगाइये।
इसे ऐसे समझिये कि एक आदिम भाषा थी जिसे आधुनिक दौर में प्रोटो इंडो योरोपियन के नाम से पुकारते हैं, फिर फारस और सिंध की तरफ इसी से एक शाखा और विकसित हुई जिसे प्रोटो इंडो इरानियन के रूप में जाना गया और इसी से आगे वह संस्कृत निकली जिसे वैदिक संस्कृत के रूप में जानते हैं। योरप या भूमध्यसागर के आसपास, फारस में पाये गये इस भाषा के प्रमाणों को आप इसी तरह अलग-अलग रख सकते हैं पर एक चीज फिर भी माननी पड़ेगी कि डेढ़ हजार ईसापूर्व वेद या वैदिक देवता अस्तित्व में आ चुके थे और उनकी खबर अरब और तुर्की सीरिया तक थी। प्रोटो इंडो ईरानियन में अवेस्ता की रचना हुई जो वेदों की तरह चार भागों में है (सेमेटिक में भी तौराह, जबूर, इंजील, कुरान चार किताबें हैं) और वेदों से इनमें काफी साम्य है। वेद का अर्थ अवेस्ता या अवेस्ता का अर्थ वेद भी होता है। एक बात तो तय है कि दोनों ग्रंथ एक ही परिवार के लोगों ने लिखे है।
भाषा विज्ञानी राजेंद्र प्रसाद जी के अनुसार इनमें एक शब्द 'ल' की क्रोनालाॅजी के हिसाब से इनकी प्राचीनता तय की जा सकती है। यानि भारत के संपर्क में आने पर इन ग्रंथों में 'ल' का इस्तेमाल बढ़ता गया। ऋग्वेद के पुराने मंडलों के मुकाबले नये मंडलों में 'ल' का इस्तेमाल आठ गुना है, जबकि अथर्ववेद में सात गुना है। इससे दो बातों का अंदाजा होता है कि ऋग्वेद के बाद के मंडल अथर्ववेद के काल के हो सकते हैं और इसी आधार पर अथर्ववेद, ऋग्वेद के मुकाबले सबसे नवीन माना गया। अब यही आधार अगर अवेस्ता पर लागू करें तो उसमें 'ल' का नितांत अभाव है जिससे यह अंदाजा भी होता है कि उसकी रचना वेदों से पहले हुई होगी।

क्रमशः

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