Ashfaq Ahmad
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इवाॅल्यूशन

 


क्या इंसान बन्दर से इवाॅल्व हुआ है

मैंने कई लोगों को बड़ी शान से यह सवाल उठाते देखा है कि अगर आदमी बंदर से इवाॅल्व हुआ है तो अब तक दुनिया में बंदर क्यों हैं? यह सवाल पूछने वाला अपनी धार्मिक आस्था से बंधा होता है और उसे पूरा यकीन होता है कि ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि इंसान को तो सीधे ईश्वर ने उसके आधुनिक रूप में धरती पर उतारा है।

ऐसा करते हुए न सिर्फ वह इंसानी विकास के पुरातत्विक प्रमाणों को दरकिनार कर रहा होता है बल्कि अपनी समझ में बड़ी बुद्धिमता दिखाने की कोशिश कर रहा होता है जबकि हकीकत में यह ख्याल इस हद तक अहमकाना है कि इस पर सिर्फ हंसा जा सकता है।

सवाल यह नहीं है कि इंसान किसी बंदर से इवाॅल्व हुआ या नहीं.. वह हर किसी की अपनी आस्था और मान्यता है। कोई मान ले कि पत्थर में भगवान है तो यह उसकी अपनी आस्था है और किसी दूसरे को इससे परेशानी नहीं होनी चाहिये। परेशानी तब खड़ी होती है जब आस्था को फैक्ट मान कर उसे साबित करने की जिद पाल ली जाती है।
इवाॅल्यूशन थ्योरी नहीं है, यह फैक्ट है.. यह सभी जीवों, पेड़-पौधों और जमीन तक में होता है। कभी समुद्र में डूबा रहने वाला किनारा आज हिमालय के रूप में सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला है.. यह जमीन का इवाॅल्यूशन ही तो है। आप यहाँ कहेंगे कि अगर समुद्री किनारे से हिमालय बन गया तो दुनिया में अभी तक दूसरे समुद्री किनारे क्यों मौजूद हैं।


मुर्गियां, शुतुरमुर्ग, कीवी आदि देखे हैं.. उनके पास पंख होते हैं लेकिन वे उड़ते नहीं बल्कि चलते, दौड़ते हैं, मानेंगे कि इन्हें बनाने वाले ने गलत डिजाइनिंग कर दी पंख दे कर, जिनकी जरूरत नहीं थी। यह उसी इवाॅल्यूशन का हिस्सा हैं जो बताते हैं कि कभी इनके पुरखे उड़ते थे लेकिन फिर जरूरत नहीं रह गयी तो उड़ना छूट गया लेकिन अवशेषी अंगों के रूप में पंख रह गये। अब आप कहेंगे कि ऐसा था तो कव्वे, कबूतर, चील, बाज क्यों नहीं उड़ना छोड़ कर जमीन पर चलने लगे। वे अभी भी क्यों उड़ रहे है?
आपने व्हेल देखी है.. पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी उम्र पानी में रहती है लेकिन बाकी जलचरों की तरह गलफड़े न होने की वजह से पानी से ऑक्सीजन नहीं ले पाती बल्कि सांस लेने के लिये उसे ऊपर आना पड़ता है। इनकी अस्थियां मैमल्स की तरह भारी होती हैं, इसके पिंजर में पिछले पैरों की अवशेषी अस्थियां होती हैं और पानी में जलचरों की तरह तैरने के लिये दुम को दायें-बायें न करके थलचरों की तरह ऊपर-नीचे करती हैं। आप मानेंगे कि यह गलत डिजाइनिंग हैं क्रियेटर की?

नहीं, यह इवाॅल्यूशन का हिस्सा है जो बताता है कि कभी उसके पुरखे जमीन पर रहा करते थे जिन्होंने बाद में पानी को अपना घर बना लिया। आप पूछेंगे अब कि ऐसा था तो सारी मछलियां सांस लेने क्यों नहीं ऊपर आतीं।

खुद को देखिये.. कभी इंसान जानवर जैसा था, बिना पका मांस या कच्ची वनस्पति ही खाता था, खतरों भरा असुरक्षित जीवन जीता था तो उस हिसाब से शरीर था लेकिन आग, खेती और स्थाई आवास के आविष्कार के बाद उसके जीने का ढंग बदल गया लेकिन अपेंडिक्स, इरेक्टर पिल्ली, अक्कल दाढ़, साईनस, टाॅन्सिल्स, कान को हिलाने वाली मांसपेशी,आंखों के कोनों पर पाई जाने वाली झिल्ली और छः माह के बच्चे में पाया जाने वाला ग्रास्प रिफ्लेक्स जैसे कई अवशेषी अंग और आदतें उसके पुराने वजूद की गवाही देते हैं। यही इवाॅल्यूशन है।

होमो फ्लोरेसिएंसिस इवाॅल्यूशन की स्पष्ट गवाही देते हैं

इवाॅल्यूशन का मतलब यह कदापि नहीं कि बंदर से आदमी बना है तो सारे बंदरों को आदमी बन जाना चाहिये। यह कहना ही गलत है कि बंदर से इंसान बना.. डार्विन की इवाॅल्यूशन थ्योरी का अर्थ यह कभी था ही नहीं बल्कि यह था कि कोई मानवाकार कपि इंसान और बंदर दोनों का ही पूर्वज हो सकता है।


यानि इसे यूं समझिये कि एक चिम्प ग्रुप था जिसकी अगली पीढ़ी में दो ग्रुप्स बने और दोनों अलग-अलग निकल गये, दोनों को पनपने के लिये एकदम विपरीत परिस्थितियां मिलीं और दोनों ही अलग-अलग रूप में अपने आसपास की स्थितियों के अनुरूप इवाॅल्व हुए। एक को आप इंसान कह लीजिये और दूसरे को बंदर कह लीजिये। बंदर हमारा चचाजाद भाई हो सकता है लेकिन वह हमारा पूर्वज नहीं है।

इसे एक दूसरे उदाहरण से समझिये कि जब पृथ्वी पर होमो सेपियंस के अतिरिक्त इंसानों की दूसरी प्रजातियाँ भी मौजूद थीं, तब इंडोनेशिया के ही एक अन्य द्वीप फ्लोरेंस पर बसे मनुष्य बौने होने की प्रक्रिया से गुजरे और आगे चल कर वे होमो फ्लोरेसिएंसिस के रूप में जाने गये।
वस्तुतः वे वहां तब पहुंचे थे जब समुद्र का स्तर असाधारण रूप से निचला था और वे वहां जमीनी रास्ते से पहुंचे थे लेकिन बाद में जलस्तर बढ़ने से वे वहीं फंसे रह गये, जो जगह संसाधनों की दृष्टि से कमजोर थी और तब वहां जो अगली पीढ़ियां उत्पन्न हुईं वे कम ऊर्जा के उपभोग पर जिंदा रह पाने की बाध्यता के चलते आकार में छोटे होते गये। उनकी लंबाई अधिकतम एक मीटर और वजन 25 किलो तक होता था। इसके बावजूद वे हाथियों का शिकार तक करने में सक्षम थे.. यह बात और है कि अनुकूलन की दृष्टि से हाथी भी बौने ही होते थे।

अब उन्हें ले कर क्या यह दावा किया जा सकता है कि अगर वे बौने होमो फ्लोरेसिएंसिस हमारे ही भाई बंधु थे तो दुनिया में अब लंबे चौड़े इंसान क्यों हैं.. दुनिया के सारे ही इंसान उनके जैसे बौने क्यों न हो गये?

इवाॅल्यूशन कैसे होता है

इसे एक और उदाहरण से समझिये.. मान लीजिये कि एक कबूतर है, जिसके बारे में आपको पता है कि वह उड़ता है जिससे न सिर्फ वह भोजन हासिल करता है बल्कि शिकारी पक्षियों से भी बचता है। अब सपोज वह किसी ऐसे आईलैंड पर पहुंच जाता है जहां कोई दूसरा प्रतियोगी नहीं है और न ही उसका कोई प्राकृतिक शिकारी है। खाना बेशुमार उपलब्ध है और उसके लिये उड़ने की जरूरत ही नहीं। अब उसके लिये उड़ने की जरूरत खत्म हो जायेगी। पीढ़ी दर पीढ़ी यह इनफार्मेशन जेनेटिकली उसके डीएनए के जरिये आगे कैरी होती रहेगी कि अब खतरों से बचने या भोजन पाने के लिये उड़ने की जरूरत ही नहीं।

तो इस दशा में कुछ सौ साल में उसकी काया ही बदल जायेगी। भरपूर खुराक और सुरक्षित जीवन उसे बेहतर ढंग से पनपने का मौका देगा और वह आकार प्रकार में कबूतर से काफी बड़ा और कुछ हद तक अलग हो जायेगा। उसके पंख उड़ने लायक नहीं रहेंगे बल्कि मुर्गी या शुतुरमुर्ग जैसी अवस्था में पहुंच जायेंगे। तब कोई खोजी अगर यह कहेगा कि वह कबूतर है तो आप क्या उससे यह कहेंगे कि चूंकि आपकी धार्मिक किताबों में ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता तो आप ऐसा नहीं मानते। अगर ऐसा होता तो बाकी कबूतर अब तक वैसे उड़ने वाले क्यों हैं, सारे कबूतर वैसे ही लोंदे क्यों न हो गये।
तो कुल मिलाकर आपकी धार्मिक किताबों में क्या लिखा है, उस पर आपकी कितनी आस्था है.. वह आपका अपना निजी विषय है लेकिन उन चीजों को आधार बना कर जब आप किसी स्थापित फैक्ट का मजाक उड़ा रहे होते हैं तो दरअसल आप खुद अपना ही मजाक उड़ा रहे होते हैं।

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