डिजिटल जुनून: इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप कैसे बदल रहे हैं आधुनिक भारत
इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप कैसे बदल रहे हैं आधुनिक भारत
कुछ साल पहले तक इंटरनेट हमारे जीवन में एक अलग जगह हुआ करता था। हम इंटरनेट पर जाते थे— ई-मेल देखने, कोई जानकारी खोजने, किसी दूर बैठे व्यक्ति को संदेश भेजने या कोई गीत डाउनलोड करने के लिए। आज वह अंतर लगभग समाप्त हो चुका है। भारत के एक बड़े हिस्से के लिए इंटरनेट अब कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ हम कुछ समय के लिए जाते हैं; वह उस वातावरण का हिस्सा बन चुका है जिसमें हमारा रोजमर्रा का जीवन घटित होता है।
सुबह उठते ही फोन देखना, परिवार के व्हाट्सऐप संदेश पढ़ना, इंस्टाग्राम पर कुछ मिनट बिताना, यूट्यूब पर समाचार या वीडियो देखना, किसी ग्राहक को जवाब देना, किसी दुकान का प्रचार करना या किसी विद्यार्थी का ऑनलाइन पढ़ना— इन सबके बीच डिजिटल और वास्तविक जीवन की सीमा लगातार धुंधली होती जा रही है। इसी प्रक्रिया में लोग डिजिटल दुनिया के लिए अपने व्यक्तित्व के अलग-अलग रूप भी तैयार कर रहे हैं।
यही वजह है कि भारत के डिजिटल परिवर्तन की कहानी को केवल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या या स्मार्टफोन के प्रसार तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। यह उससे कहीं बड़ी कहानी है— संस्कृति, पहचान, ध्यान, आकांक्षा और प्रभाव की कहानी। इस परिवर्तन में इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है। तीनों अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन मिलकर आधुनिक भारत के डिजिटल जीवन के तीन महत्वपूर्ण पक्ष सामने रखते हैं: हम स्वयं को दूसरों के सामने कैसे प्रस्तुत करते हैं, हम क्या देखते और सीखते हैं तथा अपने लोगों से किस तरह जुड़े रहते हैं।
भारत का डिजिटल जीवन अब समाज के किनारों पर नहीं बढ़ रहा है। वह धीरे-धीरे समाज के केंद्र में प्रवेश कर चुका है।
इंटरनेट से आगे बढ़कर डिजिटल जीवन तक
भारत में इंटरनेट का विस्तार अब उस स्तर तक पहुँच चुका है जहाँ केवल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। डेटारिपोर्टल की डिजिटल २०२६: इंडिया रिपोर्ट, जो मुख्यतः २०२५ के अंतिम दौर के आँकड़ों पर आधारित है, भारत में लगभग १.०३ अरब इंटरनेट उपयोगकर्ताओं और लगभग ५० करोड़ सोशल मीडिया यूज़र आइडेंटिटीज की बात करती है। इसी रिपोर्ट में भारत के लिए यूट्यूब की लगभग ५० करोड़ और इंस्टाग्राम की लगभग ४८.१ करोड़ की रिपोर्टेड विज्ञापन पहुँच दर्ज की गई है। यहाँ यह समझना जरूरी है कि विज्ञापन पहुँच को सीधे मासिक सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन ये आँकड़े यह जरूर दिखाते हैं कि देश में डिजिटल प्लेटफॉर्म किस असाधारण स्तर पर काम कर रहे हैं।
इन आँकड़ों से भी अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत इन डिजिटल पहुँचों का कर क्या रहा है। उत्तर है— लगभग सब कुछ। लोग काम कर रहे हैं, खरीदारी कर रहे हैं, पढ़ रहे हैं, सीख रहे हैं, राजनीतिक बहस कर रहे हैं, मनोरंजन कर रहे हैं, समुदाय बना रहे हैं, अपने कारोबार का प्रचार कर रहे हैं, रिश्ते निभा रहे हैं और डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी सार्वजनिक पहचान भी तैयार कर रहे हैं।
आज स्मार्टफोन बहुत-सी चीजों का एक साथ विकल्प बन चुका है। वह टेलीविजन है, अखबार है, कक्षा है, बाजार है, टेलीफोन निर्देशिका है, विज्ञापन का माध्यम है और सामाजिक बैठक की जगह भी है। लेकिन पारंपरिक माध्यमों से उसका सबसे बड़ा अंतर यह है कि यहाँ दर्शक केवल दर्शक बनकर नहीं रहता। वह जवाब दे सकता है, प्रतिक्रिया दे सकता है और स्वयं निर्माता भी बन सकता है। यही बात डिजिटल माध्यमों को इतना प्रभावशाली बनाती है।
इंस्टाग्राम: जहाँ पहचान सार्वजनिक हो जाती है
इंस्टाग्राम कभी एक अपेक्षाकृत सरल दृश्य मंच था, जहाँ लोग तस्वीरें साझा करते थे। आज वह उससे कहीं अधिक बन चुका है। यह वह जगह है जहाँ लोग अपनी जीवनशैली दिखाते हैं, पेशेवर पहचान बनाते हैं, कारोबार का प्रचार करते हैं, राजनीतिक विचार व्यक्त करते हैं, रिश्तों को दर्ज करते हैं और कई बार अपनी लोकप्रियता को आय में बदलने की कोशिश भी करते हैं।
रील्स के विस्तार ने इस बदलाव को और तेज किया है। आज किसी व्यक्ति को दिखाई देने के लिए टेलीविजन स्टूडियो की आवश्यकता नहीं है। किसी बड़े शहर में जाकर मीडिया संस्थानों के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं है। एक स्मार्टफोन, कोई विचार और कुछ सेकंड का प्रभावशाली वीडियो कई बार किसी व्यक्ति को अपने आसपास के सीमित दायरे से बहुत आगे तक पहुँचा सकता है।
भारत में इसका महत्व और भी अधिक है। दशकों तक लोकप्रिय संस्कृति में दृश्यता के बड़े रास्ते महानगरों से होकर गुजरते थे। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और कुछ अन्य बड़े शहर मनोरंजन, फैशन, विज्ञापन और मीडिया की दुनिया के प्रमुख केंद्र बने हुए थे। सोशल मीडिया ने इस भौगोलिक व्यवस्था को काफी हद तक कमजोर किया है।
अब किसी छोटे शहर का निर्माता बिना मुंबई गए अपना दर्शक वर्ग तैयार कर सकता है। किसी क्षेत्रीय भाषा में हास्य प्रस्तुत करने वाला कलाकार अपने राज्य की सीमाओं से बाहर लोकप्रिय हो सकता है। कोई भोजन निर्माता स्थानीय व्यंजनों को राष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचा सकता है। किसी अपेक्षाकृत अनजान कस्बे का फैशन निर्माता उन ब्रांडों का ध्यान आकर्षित कर सकता है जो पहले मुख्यतः स्थापित मीडिया नेटवर्क पर निर्भर रहते थे। इंस्टाग्राम की यह वास्तव में लोकतांत्रिक शक्ति है।
लेकिन इसके साथ एक दूसरी कहानी भी जुड़ी हुई है।
हर समय दिखाई देने की कीमत
इंस्टाग्राम केवल यह नहीं दिखाता कि दूसरे लोग कैसे जी रहे हैं। वह धीरे-धीरे यह दबाव भी पैदा करता है कि हम अपना जीवन दूसरों को कैसा दिखाएँ। यही अंतर महत्वपूर्ण है। एक तस्वीर कभी केवल किसी क्षण को दर्ज करती थी, लेकिन सोशल मीडिया की तस्वीर से अब प्रदर्शन की भी अपेक्षा की जा सकती है। उसे लाइक मिल सकते हैं, कमेंट आ सकते हैं, वह आकर्षक दिखनी चाहिए, व्यक्तिगत ब्रांड को मजबूत कर सकती है और कभी-कभी उससे कमाई भी जुड़ सकती है।
इससे लगातार दिखाई देते रहने का एक अजीब दबाव पैदा होता है। यही वह जगह है जहाँ सोशल मीडिया की लत, आत्म-छवि, चिंता और डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों को नजरअंदाज करना कठिन हो जाता है। यह कहना गलत होगा कि इंस्टाग्राम का हर उपयोगकर्ता उसका आदी है। असली प्रश्न यह है कि इन प्लेटफॉर्मों की अर्थव्यवस्था किस चीज पर आधारित है।
वह चीज है— ध्यान।
उपयोगकर्ता स्क्रॉल करता है, प्लेटफॉर्म उसके व्यवहार को समझता है, फिर उसे वही सामग्री अधिक दिखाई जाने लगती है जो उसे लंबे समय तक जोड़े रखती है। इस प्रक्रिया में सबसे विचारशील सामग्री हमेशा सबसे सफल नहीं होती। कई बार वह सामग्री अधिक सफल होती है जिसे देखना, उस पर प्रतिक्रिया देना और उसे साझा करना सबसे आसान हो।
यही आधुनिक इंस्टाग्राम संस्कृति का विरोधाभास है। इसने लाखों लोगों को अपनी आवाज देने का अवसर दिया है, लेकिन साथ ही उस आवाज को लगातार प्रदर्शन में बदलने का दबाव भी पैदा किया है।
यूट्यूब: भारत का अनौपचारिक विश्वविद्यालय, रंगमंच और टेलीविजन नेटवर्क
अगर इंस्टाग्राम मुख्यतः दृश्यता की दुनिया है, तो यूट्यूब उससे कहीं बड़ा संसार है। निश्चित रूप से वहाँ छोटे वीडियो, वायरल क्लिप, मनोरंजन, मीम और बड़ी मात्रा में हल्की-फुल्की सामग्री भी मौजूद है, लेकिन यूट्यूब की भूमिका केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गई है।
करोड़ों भारतीयों के लिए यूट्यूब एक कक्षा है। विद्यार्थी वहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, मैकेनिक मशीनों के बारे में सीखते हैं, रसोइए व्यंजन बनाना सीखते हैं, उद्यमी विपणन समझते हैं, संगीत सीखने वाले वाद्ययंत्रों का अभ्यास करते हैं और सामान्य जिज्ञासा रखने वाले लोग उन विषयों की जानकारी हासिल करते हैं जो कभी केवल पुस्तकों या विशेष संस्थानों के माध्यम से उपलब्ध होती थी।
यूट्यूब भारत का एक वैकल्पिक टेलीविजन नेटवर्क भी बन चुका है। किसी निर्माता को कार्यक्रम प्रसारित करने के लिए टेलीविजन चैनल की अनुमति का इंतजार नहीं करना पड़ता। कोई पत्रकार अपना स्वतंत्र दर्शक वर्ग तैयार कर सकता है, कोई हास्य कलाकार अपना कार्यक्रम चला सकता है, कोई संगीतकार अपने गीत जारी कर सकता है, कोई शिक्षक पूरा शैक्षणिक कारोबार खड़ा कर सकता है और कोई विशेषज्ञ किसी जटिल विषय को करोड़ों लोगों के लिए सरल बना सकता है।
इस पूरी व्यवस्था के आर्थिक परिणाम भी तेजी से दिखाई देने लगे हैं। गूगल ने २०२५ में ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के अपने प्रभाव आकलन के आधार पर बताया था कि भारत में यूट्यूब के क्रिएटिव इकोसिस्टम ने देश के सकल घरेलू उत्पाद में ₹१६,००० करोड़ से अधिक का योगदान किया और ९,३०,००० से अधिक फुल-टाइम-इक्विवेलेंट रोजगारों को समर्थन दिया। यूट्यूब ने यह भी बताया कि पिछले तीन वर्षों में उसने भारतीय क्रिएटर्स, कलाकारों और मीडिया कंपनियों को ₹२१,००० करोड़ से अधिक का भुगतान किया है।
इन आँकड़ों का महत्व केवल आर्थिक आकार बताने तक सीमित नहीं है। वे यह भी बताते हैं कि ऑनलाइन निर्माता की परिभाषा बदल रही है। आज कोई क्रिएटर केवल खाली समय में वीडियो बनाने वाला व्यक्ति नहीं रह गया है। वह एक छोटा मीडिया व्यवसाय हो सकता है, जिसके साथ लेखक, कैमरामैन, एडिटर, डिजाइनर, प्रबंधक, ब्रांड साझेदार और अन्य लोग काम कर सकते हैं। क्रिएटर इकोनॉमी अब अपने आप में एक अर्थव्यवस्था का रूप ले रही है।
लेकिन यूट्यूब की अपनी एक समस्या है— एल्गोरिदम
यूट्यूब की स्वतंत्रता के साथ एक दूसरी वास्तविकता भी जुड़ी है। निर्माता किसी खाली कमरे में प्रकाशित नहीं करता; वह एक एल्गोरिदमिक वातावरण में प्रकाशित करता है। किसी वीडियो की गुणवत्ता बहुत अच्छी हो सकती है और फिर भी वह दर्शकों तक न पहुँच पाए। दूसरी ओर, कोई साधारण वीडियो केवल अपने शीर्षक, थंबनेल या विषय से पैदा हुई तत्काल जिज्ञासा के कारण बहुत लोकप्रिय हो सकता है।
इससे निर्माता पर एल्गोरिदम को समझने का दबाव आता है। वह थंबनेल का अध्ययन करता है, शीर्षकों का परीक्षण करता है, रिटेंशन ग्राफ देखता है, शुरुआती हिस्से को छोटा करता है, वीडियो डालने के समय को बदलता है और यह देखता रहता है कि दर्शक किस जगह वीडियो छोड़ देते हैं। धीरे-धीरे एक खतरा पैदा होता है— निर्माता दर्शकों के लिए नहीं, बल्कि प्लेटफॉर्म के लिए सामग्री बनाने लगे।
यह अंतर सूक्ष्म है, लेकिन महत्वपूर्ण है। इंटरनेट ने अभिव्यक्ति के लिए लगभग असीमित जगह का वादा किया था। एल्गोरिदम ने एक नई कमी पैदा कर दी है—
ध्यान की कमी।
सामग्री लगभग असीमित हो सकती है, लेकिन किसी मनुष्य के पास उसे देखने के लिए दिन में केवल चौबीस घंटे हैं।
व्हाट्सऐप: वह मंच जो मंच जैसा लगता ही नहीं
इंस्टाग्राम एक सार्वजनिक मंच जैसा है। यूट्यूब एक विशाल मीडिया पुस्तकालय जैसा है। व्हाट्सऐप कुछ अलग है। भारत के बहुत से लोगों के लिए व्हाट्सऐप सोशल मीडिया जैसा महसूस ही नहीं होता। वह बस संवाद और संपर्क का एक साधन है। शायद यही कारण है कि उसका प्रभाव इतना गहरा है।
परिवार के समूह वहीं हैं। स्कूल के समूह वहीं हैं। अपार्टमेंट समितियाँ वहीं हैं। व्यापारिक बातचीत वहीं होती है। स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क वहीं सक्रिय रहते हैं। ग्राहक पूछताछ वहीं आती है। सामुदायिक घोषणाएँ वहीं पहुँचती हैं। और अब लेन-देन तथा सार्वजनिक सेवाएँ भी धीरे-धीरे इसी संदेश-आधारित वातावरण में प्रवेश कर रही हैं।
मेटा ने बताया है कि भारत में लोग खरीदारी, संचार और सेवाओं तक पहुँच के लिए व्हाट्सऐप का बढ़ता इस्तेमाल कर रहे हैं। २०२५ में मेटा ने एक कांटार अध्ययन के हवाले से कहा था कि भारत में ९१ प्रतिशत ऑनलाइन वयस्क हर सप्ताह कारोबारों के साथ चैट करते हैं। इसी दौरान राज्य सरकारों द्वारा व्हाट्सऐप आधारित नागरिक सेवा चैटबॉट का इस्तेमाल भी सामने आया। २०२६ में व्हाट्सऐप ने भारत में जियो, एयरटेल और वीआई के लिए सीधे ऐप के भीतर प्रीपेड मोबाइल रिचार्ज जैसी सुविधाओं का विस्तार भी किया।
यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है। व्हाट्सऐप केवल संदेश भेजने वाला एप्लिकेशन नहीं रह रहा है। वह धीरे-धीरे उस परत में बदल रहा है जिसके माध्यम से लोग कारोबारों और सेवाओं से संपर्क करते हैं। इसलिए उसे केवल “चैट ऐप” कहना अब उसके वास्तविक प्रभाव को बहुत छोटा करके देखना होगा।
भरोसे की समस्या
व्हाट्सऐप की एक और विशेषता उसे भारत में विशेष रूप से शक्तिशाली बनाती है— उसकी आत्मीयता। किसी मित्र, रिश्तेदार या परिचित समुदाय समूह से आया संदेश विज्ञापन जैसा महसूस नहीं होता। वह व्यक्तिगत लगता है। यही उसकी ताकत भी है और खतरा भी।
गलत सूचना को किसी पेशेवर समाचार वेबसाइट के रास्ते आने की जरूरत नहीं है। वह इस तरह भी आ सकती है— “भाई, ये जरूर पढ़ना”, “फॉरवर्डेड ऐज़ रिसीव्ड” या “कृपया इसे सबके साथ साझा करें।” कई बार संदेश भेजने वाले व्यक्ति के साथ हमारा भावनात्मक संबंध उस सूचना की विश्वसनीयता से अधिक प्रभावशाली हो जाता है।
एन्क्रिप्शन निजी संवाद की रक्षा कर सकता है, लेकिन वह यह नहीं बता सकता कि किसी दावे में सच्चाई है या नहीं। ऑनलाइन निजता को लेकर होने वाली बहसों में यह अंतर अक्सर छूट जाता है। निजता और सत्य दो अलग समस्याएँ हैं। कोई निजी संदेश भी गलत सूचना से भरा हो सकता है और निजी संवाद की रक्षा करने वाला प्लेटफॉर्म अफवाहों, धोखाधड़ी और हेरफेर किए गए दावों के प्रसार के लिए भी प्रभावी माध्यम बन सकता है।
मेटा ने व्हाट्सऐप पर धोखाधड़ी रोकने के लिए कई उपाय जारी रखे हैं, जिनमें संदिग्ध डिवाइस लिंकिंग के बारे में चेतावनियाँ और बड़े पैमाने पर सक्रिय धोखाधड़ी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई शामिल है। इसलिए लड़ाई अब केवल संवाद को निजी रखने की नहीं है। यह लोगों को यह समझने में सक्षम बनाने की भी है कि सामने वाला व्यक्ति वास्तव में वही है या नहीं जो वह होने का दावा कर रहा है और जो सूचना साझा की जा रही है, क्या वह वास्तव में भरोसे के योग्य है।
छोटे कारोबारों के लिए ग्राहकों तक पहुँचने का नया रास्ता
डिजिटल कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है जिसे मनोरंजन पर केंद्रित चर्चाओं में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। करोड़ों छोटे कारोबारों के लिए ये प्लेटफॉर्म मनोरंजन की जगह नहीं हैं। वे व्यापार के औजार हैं।
घर से सामान बेचने वाला व्यक्ति इंस्टाग्राम के माध्यम से अपने उत्पाद दिखा सकता है। कोई स्थानीय रेस्तराँ इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप के जरिए ग्राहकों तक पहुँच सकता है। कोई शिक्षक यूट्यूब के माध्यम से विद्यार्थी खोज सकता है। कोई कारीगर वीडियो के जरिए अपना काम दिखा सकता है। कोई मोहल्ले की दुकान बिना किसी जटिल वेबसाइट के अपने ग्राहकों से संवाद कर सकती है।
मेटा के अनुसार भारत में उसके प्लेटफॉर्मों का इस्तेमाल करने वाले ९२ प्रतिशत से अधिक कारोबार सूक्ष्म, लघु या मध्यम उद्यम हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल भारत केवल बड़ी तकनीकी कंपनियों की कहानी नहीं है। यह उस छोटे व्यापारी की कहानी भी है जो बिना पारंपरिक विज्ञापन अभियान पर पैसा खर्च किए अपने इलाके से दस किलोमीटर दूर रहने वाले ग्राहक तक पहुँच सकता है।
डिजिटल क्रांति तब वास्तव में अर्थपूर्ण बनती है जब वह सामान्य लोगों की आर्थिक संभावनाओं को बदलती है।
महानगरों से बाहर फैलती प्रसिद्धि और प्रभाव
सोशल मीडिया द्वारा पैदा किए गए सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परिवर्तनों में से एक दृश्यता का पुनर्वितरण है। पुराने मीडिया तंत्र का एक केंद्र था। डिजिटल मीडिया के कई केंद्र हैं।
कोई निर्माता लखनऊ, जयपुर, इंदौर, गुवाहाटी, कोच्चि या ऐसे किसी छोटे शहर से सामने आ सकता है जिसका नाम उस क्षेत्र के बाहर बहुत कम लोगों ने सुना हो। क्षेत्रीय भाषाएँ डिजिटल दुनिया से गायब नहीं हो रही हैं। कई मामलों में वे उसके विस्तार का हिस्सा बन रही हैं।
यूट्यूब की २०२५ की सांस्कृतिक रुझान रिपोर्टिंग में भी यह बात सामने आई कि भारतीय निर्माता क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भों को वैश्विक डिजिटल संस्कृति के साथ जोड़ रहे हैं। संभव है कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों का भारतीय संस्कृति पर यह सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव हो। भारत को डिजिटल रूप से जुड़ने के लिए सांस्कृतिक रूप से एक जैसा होने की आवश्यकता नहीं है।
इंटरनेट केवल वैश्विक संस्कृति को भारत के भीतर लाने का माध्यम नहीं है। वह स्थानीय संस्कृति को भारत से बाहर ले जाने का माध्यम भी बन सकता है।
नई समस्या पहुँच नहीं, ध्यान है
भारत की डिजिटल क्रांति का पहला चरण पहुँच का था। क्या लोग ऑनलाइन आ सकते हैं? क्या वे स्मार्टफोन खरीद सकते हैं? क्या उनके पास इंटरनेट कनेक्शन है? अगला चरण अलग है। अब सवाल यह है कि कनेक्शन मिलने के बाद क्या होता है।
हमें ऑनलाइन कितना समय बिताना चाहिए? हम क्या देखते हैं, यह तय कौन करता है? हमारी पहचान का कितना हिस्सा सार्वजनिक होना चाहिए? प्रभाव और हेरफेर के बीच की सीमा कहाँ है? मनोरंजन कब निर्भरता में बदल जाता है? व्यक्तिगत संवाद कब निगरानी जैसा महसूस होने लगता है? और शायद सबसे असहज सवाल यह है— क्या हम इन प्लेटफॉर्मों का इस्तेमाल कर रहे हैं, या ये प्लेटफॉर्म धीरे-धीरे हमारे व्यवहार को आकार दे रहे हैं?
इसका कोई सरल उत्तर नहीं है। इंस्टाग्राम अपने आप में हानिकारक नहीं है। यूट्यूब अपने आप में शैक्षणिक नहीं है। व्हाट्सऐप अपने आप में विश्वसनीय नहीं है। हर प्लेटफॉर्म एक औजार है, लेकिन साथ ही वह मनुष्य के व्यवहार के कुछ खास रूपों को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया एक तंत्र भी है।
इंस्टाग्राम दृश्य ध्यान को पुरस्कृत करता है। यूट्यूब लंबे समय तक देखने को बढ़ावा देता है। व्हाट्सऐप संवाद और नेटवर्क में भागीदारी को मजबूत करता है। इसलिए सोशल मीडिया को केवल अच्छा या बुरा घोषित करने के बजाय उसके पीछे काम करने वाले इन प्रोत्साहनों को समझना कहीं अधिक उपयोगी है।
आधुनिक भारत अपने डिजिटल रूप के साथ जीना सीख रहा है
भारत का डिजिटल परिवर्तन अब पीछे नहीं लौटने वाला। आने वाले वर्षों में अधिक एआई, अधिक क्रिएटर टूल्स, अधिक डिजिटल वाणिज्य, अधिक व्यक्तिगत फीड और संचार तथा रोजमर्रा की सेवाओं के बीच अधिक एकीकरण देखने को मिलेगा।
प्लेटफॉर्म बदलेंगे। कुछ समाप्त हो जाएँगे। दूसरे नए प्लेटफॉर्म सामने आएँगे। लेकिन उन्होंने जिन व्यवहारों को जन्म दिया है, वे आसानी से समाप्त नहीं होंगे। आज हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहाँ कोई व्यक्ति टेलीविजन स्टूडियो में गए बिना प्रसिद्ध हो सकता है, दुकान किराए पर लिए बिना कारोबार शुरू कर सकता है, कक्षा में गए बिना हजारों लोगों को पढ़ा सकता है, एक ही शहर में रहे बिना समुदाय बना सकता है और हथेली में रखे एक उपकरण के जरिए हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों से संबंध बनाए रख सकता है।
यह एक असाधारण उपलब्धि है। लेकिन यह एक जिम्मेदारी भी है। डिजिटल क्रांति ने सामान्य लोगों को ध्यान तक ऐसी पहुँच दी है जो इतिहास में पहले कभी नहीं थी। अब चुनौती यह सीखने की है कि इस ध्यान का उपयोग कैसे किया जाए, बिना इस बात की अनुमति दिए कि वही ध्यान हमें इस्तेमाल करने लगे।
इंस्टाग्राम ने बदल दिया है कि भारत स्वयं को किस तरह देखता है। यूट्यूब ने बदल दिया है कि भारत किस तरह सीखता, मनोरंजन करता और सृजन करता है। व्हाट्सऐप ने बदल दिया है कि भारत किस तरह संवाद करता है। इन तीनों ने मिलकर इससे भी बड़ा परिवर्तन किया है।
उन्होंने रोजमर्रा के जीवन के केंद्र को भौतिक दुनिया से एक ऐसे मिश्रित संसार की ओर धकेलने में भूमिका निभाई है जहाँ भारत का ऑफलाइन और ऑनलाइन रूप लगातार एक-दूसरे में घुलता जा रहा है। आने वाले वर्षों का असली सवाल यह नहीं है कि भारत डिजिटल बना रहेगा या नहीं। वह बना रहेगा।
असली सवाल यह है कि भारत किस तरह की डिजिटल संस्कृति का निर्माण करना चाहता है।
—Ashfaq Ahmad


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