बदलती हवा, बढ़ती गर्मी: भारत का नया पर्यावरणीय संकट
भारत का नया पर्यावरणीय संकट
भारत में पर्यावरणीय चिंता अब किसी असामान्य मौसम घटना या सर्दियों में आने वाली कुछ सप्ताह की धुंध तक सीमित नहीं रह गई है। गर्मियों में बढ़ती गर्मी, मानसून के बदलते स्वरूप, अचानक होने वाली अत्यधिक वर्षा और उत्तर भारत में सर्दियों के साथ लौटने वाला वायु प्रदूषण अब सामान्य जीवन के अनुभव का हिस्सा बनते जा रहे हैं। समस्या किसी एक मौसम या किसी एक शहर की नहीं है। गर्मी, वायु प्रदूषण, शहरीकरण, परिवहन, उद्योग, कृषि और बदलते मौसम के बीच संबंध लगातार अधिक स्पष्ट हो रहा है और यही भारत की पर्यावरणीय चुनौती को पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल बनाता है।
भारत का तापमान बदल रहा है
भारत की पर्यावरणीय स्थिति को समझने के लिए तापमान से शुरुआत करना उपयोगी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, 2025 में देश के भू-भाग का वार्षिक औसत सतही वायु तापमान 1991–2020 के दीर्घकालिक औसत से 0.28 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा और 1901 से शुरू हुए देशव्यापी तापमान अभिलेखों में 2025 आठवाँ सबसे गर्म वर्ष रहा। इससे पहले 2024 सबसे गर्म वर्ष रहा था, जब औसत तापमान दीर्घकालिक औसत से 0.65 डिग्री सेल्सियस अधिक था। राष्ट्रीय औसत में दिखाई देने वाला यह अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन लंबे समय में तापमान में ऐसे परिवर्तन गर्मी से होने वाले स्वास्थ्य जोखिम, पानी की मांग, बिजली की खपत, कृषि और वायुमंडल में प्रदूषकों के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
जमीन पर इसका अनुभव किसी राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक तीखा हो सकता है। 2026 के दौरान भारत मौसम विज्ञान विभाग ने देश के अनेक हिस्सों में लू की चेतावनी जारी की और उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान तथा मध्य और पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में सामान्य से अधिक गर्मी की संभावना जताई। मई और जून के दौरान उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में लू और भीषण लू की स्थितियाँ दर्ज की गईं। इसका अर्थ यह है कि गर्मी को अब केवल मौसमी असुविधा मानकर नहीं देखा जा सकता; इसका संबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य, बिजली की मांग, जल संसाधनों और शहरों की कार्यक्षमता से भी जुड़ चुका है।
हवा की समस्या कहीं अधिक गंभीर है
वायु प्रदूषण भारत के पर्यावरणीय संकट का दूसरा और अधिक स्थायी पक्ष है। 2025 के नवीनतम पूर्ण-वर्षीय वैश्विक आकलन के अनुसार, भारत में वार्षिक औसत पीएम2.5 सांद्रता 48.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रही। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के वार्षिक 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के दिशानिर्देश से लगभग 9.8 गुना अधिक है। इस आकलन में भारत 143 देशों और क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के स्तर के आधार पर छठे स्थान पर रहा। राष्ट्रीय औसत अपने आप में चिंताजनक है, लेकिन अलग-अलग शहरों की स्थिति इससे भी अधिक गंभीर हो सकती है।
दिल्ली इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। 2025 में दिल्ली की वार्षिक औसत पीएम2.5 सांद्रता 99.6 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रही। यह 2024 के 108.3 माइक्रोग्राम से कुछ कम थी, लेकिन इसके बावजूद दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित प्रमुख शहरों में पहले स्थान पर रही। इस अंतर को समझना जरूरी है। किसी शहर के प्रदूषण में एक वर्ष की तुलना में कमी आना निश्चित रूप से सकारात्मक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि समस्या समाप्त हो गई। स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रदूषण का स्तर अभी भी बहुत ऊँचा हो सकता है, भले ही पिछले वर्ष की तुलना में उसमें कुछ सुधार हुआ हो।
यह समस्या केवल दिल्ली की नहीं है। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के स्रोत अलग-अलग अनुपात में काम करते हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआँ, कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों का उपयोग, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण और सड़कों की धूल, कचरा जलाना, घरेलू ईंधन और कृषि अवशेषों का मौसमी दहन— ये सभी इसमें योगदान करते हैं। इसलिए किसी एक शहर पर ध्यान केंद्रित करके पूरे संकट का समाधान नहीं किया जा सकता। विश्व बैंक ने 2026 में भी इस बात पर जोर दिया है कि वायु प्रदूषण को पूरे वायुमंडलीय क्षेत्र के स्तर पर देखना होगा, क्योंकि प्रदूषण प्रशासनिक सीमाओं के भीतर नहीं रुकता। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में शुरू किए गए नए कार्यक्रमों का लाभ लगभग 27 करोड़ लोगों तक पहुँचने की अपेक्षा है।
प्रदूषण दिखाई देने से पहले स्वास्थ्य को प्रभावित करता है
वायु प्रदूषण की चर्चा अक्सर धुंध से शुरू होती है, जबकि उसका सबसे गंभीर प्रभाव आँखों से दिखाई नहीं देता। सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुँच सकते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने का संबंध हृदय रोग, मस्तिष्काघात, फेफड़ों के कैंसर, दीर्घकालिक श्वसन रोग और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से है। स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में भारत और चीन दोनों में वायु प्रदूषण से संबंधित 20 लाख से अधिक मौतें अनुमानित की गईं। यह संख्या बताती है कि वायु प्रदूषण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक बड़ा प्रश्न है।
इसका प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर समान नहीं पड़ता। बच्चे, बुजुर्ग, खुले वातावरण में काम करने वाले लोग और पहले से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम झेल रहे लोग अधिक प्रभावित हो सकते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के पास प्रदूषण से बचने के विकल्प भी अपेक्षाकृत कम होते हैं। दूसरी ओर, घरेलू वायु प्रदूषण के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। 2013 से 2023 के बीच ठोस ईंधनों से होने वाले घरेलू वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने वाली भारत की आबादी का अनुपात 63 प्रतिशत से घटकर 42 प्रतिशत हुआ है। यह सुधार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी बताता है कि घरेलू प्रदूषण की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण का संबंध
जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण को अक्सर दो अलग-अलग समस्याओं के रूप में देखा जाता है। एक को तापमान और मौसम का विषय माना जाता है और दूसरे को शहरों की हवा का। वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। गर्मी वायुमंडलीय रासायनिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है और धरातलीय ओज़ोन के निर्माण में योगदान दे सकती है। लंबे समय तक शुष्क मौसम धूल की समस्या बढ़ा सकता है, जबकि कुछ मौसमीय परिस्थितियाँ प्रदूषकों को वातावरण में अधिक समय तक रोक सकती हैं। दूसरी ओर, जीवाश्म ईंधनों का दहन जैसे कई स्रोत एक साथ वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन दोनों को बढ़ाते हैं।
भारत में यह संबंध अलग-अलग मौसमों में अलग रूप दिखाई देता है। गर्मियों में अत्यधिक तापमान के साथ धूल और ओज़ोन की चिंता बढ़ सकती है, मानसून वातावरण में प्रदूषकों के फैलाव को बदल देता है और अत्यधिक वर्षा की नई समस्याएँ पैदा कर सकता है, जबकि मानसून के बाद और सर्दियों में उत्तर भारत में कृषि अवशेषों का दहन, वाहनों और उद्योगों का उत्सर्जन तथा स्थिर वायुमंडलीय परिस्थितियाँ एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं। इसलिए भारत की पर्यावरणीय समस्या किसी एक मौसम की एक जैसी समस्या नहीं है, बल्कि पूरे वर्ष अलग-अलग रूपों में सामने आने वाले दबावों का एक जटिल समूह है।
सुधार भी हो रहा है, लेकिन तस्वीर अभी अधूरी है
भारत में वायु गुणवत्ता सुधारने के प्रयासों को पूरी तरह असफल बताना भी तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम अब केवल योजना बनाने के स्तर पर नहीं है और इसके अंतर्गत कई शहरों में मापने योग्य सुधार दर्ज हुए हैं। सितंबर 2026 में सरकार द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के अंतर्गत आने वाले 130 शहरों में से 108 शहरों में 2025–26 के दौरान वार्षिक पीएम10 स्तर 2017–18 की आधार अवधि की तुलना में कम हुआ। इनमें 72 शहरों में 20 प्रतिशत से अधिक और 26 शहरों में 40 प्रतिशत से अधिक कमी दर्ज की गई, जबकि 14 शहर राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों तक पहुँच गए।
इन आँकड़ों को सकारात्मक संकेत के रूप में देखना चाहिए, लेकिन इनके अर्थ को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं समझना चाहिए। पीएम10 में कमी का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक प्रदूषक सुरक्षित स्तर पर पहुँच गया है और किसी एक शहर में सुधार का अर्थ यह भी नहीं है कि पूरे क्षेत्र की हवा साफ हो गई। 2025–26 के सरकारी आँकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के 130 शहरों में से 65 शहरों ने वार्षिक पीएम2.5 के राष्ट्रीय मानक को पूरा किया, जबकि दिल्ली का वार्षिक पीएम2.5 स्तर 102 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। इसलिए सुधार वास्तविक है, लेकिन वह असमान है और अभी बहुत लंबा रास्ता बाकी है।
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खराब हवा की आर्थिक कीमत
वायु प्रदूषण का आर्थिक प्रभाव उसके स्वास्थ्य प्रभाव से अलग नहीं है। जब प्रदूषित हवा बीमारियाँ बढ़ाती है, तो इसका असर केवल अस्पतालों और दवाओं के खर्च तक सीमित नहीं रहता। काम के दिन कम होते हैं, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, परिवारों के स्वास्थ्य खर्च बढ़ते हैं, कर्मचारियों की उत्पादकता घटती है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। विश्व बैंक के अनुसार, 2019 में वायु प्रदूषण से जुड़ी समय से पहले होने वाली मौतों और बीमारियों के कारण भारत को लगभग 36.8 अरब डॉलर के उत्पादन नुकसान का अनुमान था, जो उस समय देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.36 प्रतिशत था।
यहीं भारत के विकास मॉडल की एक बड़ी चुनौती सामने आती है। देश को सड़कें, आवास, बिजली, उद्योग, परिवहन और नए शहर चाहिए, लेकिन इनका निर्माण किस तरह किया जाता है, यह तय करता है कि आर्थिक विकास लोगों के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर करेगा या नई स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा करेगा। बेहतर सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा, औद्योगिक तकनीक में सुधार, निर्माण और सड़क की धूल पर नियंत्रण तथा क्षेत्रीय स्तर पर नियोजित विकास इसलिए केवल पर्यावरणीय उपाय नहीं हैं। वे आने वाली अर्थव्यवस्था की आवश्यकता भी हैं।
तकनीक मदद कर सकती है, लेकिन समाधान केवल तकनीक नहीं है
भारत के पास अब पहले की तुलना में बेहतर वायु गुणवत्ता निगरानी व्यवस्था, मौसम और प्रदूषण पूर्वानुमान की अधिक सक्षम प्रणालियाँ और पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने वाली नई तकनीकें हैं। वायु गुणवत्ता सेंसर, उपग्रह आधारित निगरानी, प्रदूषण पूर्वानुमान, विद्युत परिवहन और स्वच्छ औद्योगिक तकनीकें नीति निर्माण को अधिक वैज्ञानिक बना सकती हैं। लेकिन किसी शहर में प्रदूषण का स्तर खतरनाक होने की जानकारी मिल जाना अपने आप में समाधान नहीं है। असली प्रश्न यह है कि उस जानकारी के आधार पर उत्सर्जन कम करने और लोगों को सुरक्षित रखने के लिए कितनी प्रभावी कार्रवाई की जाती है।
इसी कारण 2026 में वायु प्रदूषण के लिए पूरे वायुमंडलीय क्षेत्र को आधार बनाकर योजना बनाने की आवश्यकता अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। एक शहर के बाहर स्थित औद्योगिक क्षेत्र दूसरे शहर की हवा को प्रभावित कर सकता है, सैकड़ों किलोमीटर दूर कृषि अवशेषों का दहन किसी महानगर के प्रदूषण स्तर को प्रभावित कर सकता है और एक ही मौसम प्रणाली में वाहनों, निर्माण और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषक जमा हो सकते हैं। इसलिए प्रभावी समाधान के लिए राज्यों, शहरों, परिवहन एजेंसियों, उद्योगों, कृषि समुदायों और स्वास्थ्य संस्थानों के बीच समन्वय आवश्यक है।
प्रदूषण का मानसिक प्रभाव भी है
पर्यावरणीय संकट का एक प्रभाव ऐसा है जिसे आँकड़ों में मापना कठिन है। जब कोई परिवार यह तय करने से पहले वायु गुणवत्ता देखता है कि बच्चों को बाहर खेलने देना है या नहीं, जब कोई व्यक्ति सुबह की सैर से पहले प्रदूषण का स्तर जाँचता है या जब खिड़की खोलने का निर्णय भी मौसम और हवा की गुणवत्ता पर निर्भर करने लगता है, तब पर्यावरण केवल बाहरी परिस्थिति नहीं रहता। वह रोजमर्रा के मानसिक निर्णयों का हिस्सा बन जाता है।
इसे हर व्यक्ति में किसी चिकित्सकीय मानसिक बीमारी का नाम देना उचित नहीं होगा, लेकिन पर्यावरण को लेकर बढ़ती बेचैनी को पूरी तरह नकारना भी कठिन है। मौसम के पुराने अनुमान बदल रहे हों, गर्मियाँ अधिक कठिन लग रही हों, सर्दियों में हवा पर भरोसा न किया जा सके और पानी तथा तापमान दोनों को लेकर अनिश्चितता बढ़ती जाए, तो भविष्य को लेकर चिंता स्वाभाविक है। भारत जैसे तेजी से शहरीकरण कर रहे देश में यह मानसिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना तापमान, पीएम2.5 या एक्यूआई के आँकड़े।
भारत का पर्यावरणीय प्रश्न अब विकास का प्रश्न है
भारत के सामने विकास और पर्यावरण में से किसी एक को चुनने की सरल स्थिति नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि ऐसा विकास मॉडल कैसे बनाया जाए जिसमें उद्योग, परिवहन, आवास और ऊर्जा की बढ़ती जरूरतें लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता की कीमत पर पूरी न हों। वायु प्रदूषण से निपटने के लिए पूरे वायुमंडलीय क्षेत्र के स्तर पर दीर्घकालिक योजना बनाने की दिशा में बढ़ता जोर इसी बदलाव का संकेत है।
स्थिति में सुधार के कारण भी मौजूद हैं। स्वच्छ घरेलू ईंधनों के विस्तार से घरेलू वायु प्रदूषण का जोखिम कम हुआ है, अनेक शहरों में पीएम10 के स्तर में वास्तविक कमी आई है, निगरानी व्यवस्था पहले से बेहतर हुई है और सरकारी नीतियाँ अधिक आँकड़ा-आधारित हो रही हैं। लेकिन समस्या का आकार इतना बड़ा है कि कुछ शहरों की सफलता, कुछ दिनों की बेहतर हवा या किसी एक तकनीकी उपाय से इसका स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
भारत की पर्यावरणीय चुनौती अंततः जीवन की गुणवत्ता का प्रश्न है। बात केवल इतनी नहीं है कि किसी सर्द सुबह वायु गुणवत्ता सूचकांक कितना रहा या किसी गर्मी में तापमान कितने डिग्री ऊपर चला गया। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत ऐसे शहर, उद्योग, परिवहन और ऊर्जा तंत्र बना सकता है जहाँ स्वच्छ हवा और जलवायु के प्रति अनुकूलन को विकास के बाद मिलने वाली सुविधा न समझा जाए, बल्कि विकास के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे का हिस्सा माना जाए।
—Ashfaq Ahmad






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