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भारतीय संस्कृति और प्राचीन सभ्यताओं के संबंध— भाग 6


भारतीय संस्कृति और दूसरी प्राचीन सभ्यताओं के बीच क्या रिश्ता है?

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पिछले भागों में हमने देखा कि मानव समाजों के विकास में टोटेम और सामुदायिक पहचान की कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। किसी समुदाय के लिए कोई पशु, पक्षी, सर्प, प्राकृतिक शक्ति या दूसरी प्रतीकात्मक आकृति केवल पहचान का चिह्न नहीं होती थी। कई बार वही उसकी धार्मिक मान्यता का केंद्र भी बन जाती थी। इस तरह टोटेम अपने आप में धार्मिक विश्वासों का एक रूप बन सकते थे।

अब एक बात पर गौर कीजिए। जब अलग-अलग समुदायों के बीच संपर्क बढ़ा, उनके क्षेत्र विस्तृत हुए, संसाधनों पर अधिकार को लेकर संघर्ष हुए, व्यापार बढ़ा और लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने लगे, तो उनकी मान्यताएँ भी एक-दूसरे से प्रभावित हुईं। समुद्र के किनारे रहने वाले और समुद्री यात्राएँ करने वाले समुदायों की इसमें विशेष भूमिका रही। पॉलिनेशियन, मेलानेशियन और फिनीशियन जैसे समुदायों के समुद्री संपर्कों को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है।

यह सब किसी एक भूभाग तक सीमित नहीं था। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सदियों तक ऐसे संपर्क होते रहे। इसी वजह से विभिन्न सभ्यताओं के धार्मिक नामों, देवताओं, कथाओं और प्रतीकों में कई बार समानताएँ दिखाई देती हैं। बेशक, केवल समानता देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसने किससे क्या लिया, लेकिन इन समानताओं को नज़रअंदाज़ करना भी उचित नहीं होगा।

चलिए, पूरी दुनिया के बजाय पहले मिस्र पर ध्यान देते हैं।

मिस्र की धार्मिक परंपराएँ और भारत से उनकी समानताएँ

प्राचीन मिस्र में भी मृत्यु के बाद जीवन की निरंतरता से जुड़ी मान्यताएँ थीं। वहाँ अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती थी और अलग-अलग पशु-पक्षियों तथा प्राकृतिक प्रतीकों का धार्मिक महत्त्व था। भारत की तरह वहाँ भी स्थानीय मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं की विविधता थी।

अब कल्पना कीजिए कि यदि मिस्र की धार्मिक परंपराएँ बाद के धार्मिक और राजनीतिक परिवर्तनों से उसी तरह प्रभावित न हुई होतीं, तो क्या वहाँ भी भारत जैसी विविध धार्मिक परंपराएँ देखने को मिल सकती थीं? यह एक विचारणीय संभावना है, हालाँकि इसे प्रमाणित ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

मिस्र के इतिहास में मेनेस को उस शासक के रूप में याद किया जाता है, जिसने उत्तरी और दक्षिणी मिस्र को एकीकृत किया। परंपरागत कालक्रम में मिस्र का राजवंशीय इतिहास लगभग 3100 ईसा पूर्व से शुरू माना जाता है। बाद में वहाँ अनेक राजवंशों ने शासन किया और 332 ईसा पूर्व में सिकंदर के आगमन के साथ मिस्र के इतिहास में एक नया चरण शुरू हुआ।

भारतीय परंपरा में मनु का नाम मानव समाज की उत्पत्ति से जुड़ी कथाओं में आता है। मेनेस और मनु के नामों को साथ रखकर तुलना करने का विचार रोचक हो सकता है, लेकिन दोनों के बीच प्रत्यक्ष ऐतिहासिक संबंध का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसी तरह, मिस्र और भारत के आरंभिक इतिहास को कैस्पियन सागर की दिशा से फैले आर्य समुदायों के प्रभाव के आधार पर पूरी तरह समझाना भी उचित नहीं होगा।

मिस्र के प्राचीन देवताओं में प्ताह का महत्त्वपूर्ण स्थान था। मेम्फिस की धार्मिक परंपरा में उसे सृष्टिकर्ता देवता माना जाता था। सृष्टि, आदिम अवस्था और ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित मिस्री मान्यताओं में अलग-अलग रूप मिलते हैं। कुछ परंपराओं में आदिम जल, प्रथम भूमि और सृष्टि के उद्भव की कल्पनाएँ प्रमुख थीं।

ऐसी अवधारणाओं की तुलना दूसरी सभ्यताओं की सृष्टि-कथाओं से की जा सकती है। लेकिन यह तय करने के लिए कि उनमें से कौन-सी मान्यता कहाँ से आई, हमें केवल प्रतीकों की समानता नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक संदर्भ भी देखने होंगे।

हेलियोपोलिस, सूर्य और पक्षी के प्रतीक

मिस्र के धार्मिक इतिहास में हेलियोपोलिस का विशेष स्थान था। इसका प्राचीन नाम ऑन था और यह सूर्य-पूजा का महत्त्वपूर्ण केंद्र बना। यहाँ की एक प्रसिद्ध धार्मिक परंपरा में बेनबेन नामक पिरामिडाकार पत्थर का उल्लेख मिलता है। इससे जुड़ी कथा में सूर्य के प्रकट होने और फीनिक्स जैसे पक्षी का प्रतीकात्मक संबंध बताया जाता है।

मिस्र की धार्मिक परंपराओं में रा, आतुम और एटेन जैसे सूर्य-संबंधी देवताओं के अलग-अलग रूप मिलते हैं। शू वायु से, तेफनूत नमी से, गेब पृथ्वी से और नुत आकाश से जुड़ी थीं। इनसे संबंधित कथाओं में ओसिरिस, आइसिस, सेत, नेफ्थिस और होरस जैसे प्रमुख देवताओं की भूमिकाएँ भी आती हैं। हेलियोपोलिस की परंपरा में प्रमुख देवताओं के एक समूह को एन्नीड कहा जाता था।

अब सूर्य, पक्षी और सृष्टि से जुड़े इन प्रतीकों की तुलना भारतीय परंपराओं से कीजिए। भारत में भी सूर्य की उपासना, गरुड़ का महत्त्व और नागों से जुड़ी अनेक धार्मिक कथाएँ मिलती हैं। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी पक्षियों और सर्पों से संबंधित प्रतीक दिखाई देते हैं।

क्या इन समानताओं के पीछे कभी सांस्कृतिक संपर्क रहे होंगे? क्या व्यापार और प्रवास के माध्यम से कुछ प्रतीक एक समाज से दूसरे समाज तक पहुँचे होंगे? ये ऐसे प्रश्न हैं जिन पर विचार किया जा सकता है। लेकिन यह मान लेना कि जहाँ भी सूर्य और पक्षी साथ दिखाई दें, वहाँ गरुड़ की ही अवधारणा मौजूद थी, सही नहीं होगा। किसी प्रतीक का अर्थ उसके अपने सांस्कृतिक संदर्भ से ही समझा जा सकता है।

मिस्र में ओसिरिस और होरस से जुड़ी कथाओं का विकास भी इस दृष्टि से रोचक है। ओसिरिस मृत्यु और पुनर्जीवन से संबंधित प्रमुख देवता था, जबकि होरस का संबंध राजसत्ता और बाज़ के प्रतीक से था। अलग-अलग कालखंडों और धार्मिक परंपराओं में इनके संबंधों की व्याख्या विकसित हुई। भारत में शिव और गणेश के संबंध की तरह यहाँ भी देवताओं के बीच पारिवारिक संबंध धार्मिक आख्यानों का हिस्सा बने, लेकिन इन दोनों परंपराओं के विकास को एक ही ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

मत्स्य, सृष्टि और ड्रैगन की अवधारणा

नाग और गरुड़ के अलावा मत्स्य भी अनेक संस्कृतियों में महत्त्वपूर्ण प्रतीक रहा है। बेबीलोनिया की धार्मिक परंपरा में मनुष्य और मछली के मिश्रित स्वरूप वाले पात्रों का उल्लेख मिलता है। इनमें एक प्रसिद्ध नाम ओआनेस का है, जिसे बाद की परंपराओं में ज्ञान और सभ्यता से संबंधित माना गया।

भारतीय परंपरा में मत्स्यावतार की कथा है, जिसमें मत्स्य का संबंध मनु और प्रलय से जुड़ता है। मछली पर निर्भर रहने वाले समुदायों में भी मत्स्य का विशेष प्रतीकात्मक महत्त्व रहा हो सकता है। लेकिन किसी विशेष समुदाय में मत्स्य टोटेम था या नहीं, यह निर्धारित करने के लिए उसके अपने ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक प्रमाण देखने होंगे।

इसके बाद एक और दिलचस्प प्रतीक सामने आता है—ड्रैगन।

ड्रैगन-जैसी आकृतियाँ अलग-अलग सभ्यताओं की कला, मिथकों और धार्मिक परंपराओं में दिखाई देती हैं। कहीं उनका संबंध जल से है, कहीं वर्षा और तूफान से, तो कहीं वे विनाशकारी या संरक्षक शक्ति के रूप में सामने आते हैं। कुछ परंपराओं में ड्रैगन को वर्षा लाने वाला माना गया, जबकि दूसरी जगह वह बाढ़ या अनियंत्रित जल का प्रतीक बना।

कुछ एशियाई परंपराओं में ड्रैगन के शरीर पर 117 काँटों का वर्णन मिलता है, जिनमें 81 को शुभ और 36 को अशुभ प्रभावों से जोड़ा जाता है। उसके अनेक रूप धारण करने की कल्पना भी मिलती है। हालाँकि, इन विशिष्ट संख्याओं और गुणों को सभी संस्कृतियों में प्रचलित कोई सार्वभौमिक मान्यता नहीं मानना चाहिए।

अब दुनिया भर में जल, बादल और वज्र से संबंधित देवताओं पर गौर कीजिए।

भारतीय परंपरा में इंद्र वज्र और वर्षा से जुड़े हैं। यूनानी परंपरा में ज़्यूस और उत्तरी यूरोप की परंपराओं में थोर वज्र से संबंधित देवता हैं। अनातोलिया की हित्ती परंपरा में तूफान के देवता तार्हुंट का महत्त्व था। बेबीलोनिया में मर्दुक प्रमुख देवताओं में शामिल था। भारतीय परंपरा में वरुण का संबंध जल और ब्रह्मांडीय व्यवस्था से है।

इन सभी देवताओं को एक ही मूल से निकला हुआ मानना आवश्यक नहीं है। फिर भी, यह ध्यान देने योग्य है कि वर्षा, बिजली, तूफान और जल जैसी प्राकृतिक शक्तियाँ अनेक प्राचीन समाजों में धार्मिक कल्पनाओं का केंद्र बनीं। अलग-अलग समाजों ने इन शक्तियों को अपने परिवेश और अनुभवों के अनुसार अलग-अलग रूप दिए।

पॉलिनेशियन परंपराओं में भी ड्रैगन-जैसे जीवों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें मो-ओ या मो-को जैसे नामों से जोड़ा जाता है। बेबीलोनिया के समुद्री देवता ईआ का संबंध भी जल और सृष्टि से जुड़ी अवधारणाओं से था। ईआ तथा तियामत की कथाओं में समुद्र और दैवीय संघर्ष के रूप दिखाई देते हैं।

भारतीय परंपरा में विष्णु का शेषनाग पर समुद्र में शयन एक प्रसिद्ध धार्मिक प्रतीक है। दूसरी ओर, मिस्र में ओसिरिस का संबंध नील नदी और मृत्यु के बाद पुनर्जीवन की अवधारणा से जुड़ा था। इन सभी उदाहरणों को साथ रखकर देखा जा सकता है, लेकिन इनके बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने के लिए अतिरिक्त ऐतिहासिक प्रमाण चाहिए।

चीन और जापान में ड्रैगन: विनाशकारी भी, जीवनदायी भी

चीन में ड्रैगन का संबंध जल, वर्षा और समृद्धि से रहा है। कुछ परंपराओं में उसे जलस्रोतों का संरक्षक और वर्षा लाने वाली शक्ति माना जाता था। ड्रैगन को धन और समृद्धि से जोड़ने वाली कथाएँ भी मिलती हैं। चीनी धार्मिक और साहित्यिक परंपराओं में उसके अनेक रूप हैं।

इसके विपरीत, कुछ दूसरी संस्कृतियों में ड्रैगन या ड्रैगन-जैसे जीव विनाशकारी जल, बाढ़ या अराजकता से जुड़े हैं। यानी एक ही प्रकार का जीव एक जगह जीवनदायी शक्ति हो सकता है और दूसरी जगह भय तथा विनाश का प्रतीक।

चीनी कथाओं में ड्रैगन की आँखें खुलने और बंद होने से दिन और रात होने जैसी कल्पनाएँ भी मिलती हैं। दूसरी लोकपरंपराओं में मृत शरीर के जीवित होकर चलने या रक्त पीने की कथाएँ मौजूद हैं। ये सभी अलग-अलग सांस्कृतिक संदर्भों में विकसित हुई धारणाएँ हैं, इन्हें एक ही मान्यता का हिस्सा नहीं समझना चाहिए।

भारतीय परंपरा में नागों को भी कई जगह रक्षक माना गया है। कुछ परंपराओं में वे दिशाओं की रक्षा करते हैं, जबकि बौद्ध कला में नाग के फन से बना छत्र एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। नागकन्या और आधे मनुष्य, आधे सर्प के रूप भी भारतीय तथा आसपास की कुछ एशियाई परंपराओं में दिखाई देते हैं।

इन समानताओं से यह प्रश्न उठता है कि क्या नाग और ड्रैगन से संबंधित प्रतीकों के प्रसार में कभी सांस्कृतिक संपर्कों की भूमिका रही। लेकिन हर जगह सर्प या सर्पाकार प्राणी मिलने का अर्थ यह नहीं कि उन सभी की उत्पत्ति एक ही परंपरा से हुई थी।

गरुड़ और नाग का संघर्ष: अनेक सभ्यताओं में पक्षी और सर्प

भारतीय पौराणिक कथाओं में गरुड़ और नाग के बीच शत्रुता प्रसिद्ध है। गरुड़ को नागों का विरोधी और उन्हें अपने पंजों में पकड़कर उड़ने वाला पक्षी बताया गया है।

अब इसी प्रकार के प्रतीकों को दूसरी सभ्यताओं में देखिए। बेबीलोनिया की कुछ कथाओं और चित्रों में विशाल पक्षी तथा सर्प के बीच संघर्ष के रूप मिलते हैं। ‘जू’ नामक पौराणिक पक्षी का उल्लेख मेसोपोटामिया की धार्मिक परंपराओं में मिलता है। अलग-अलग कथाओं में उसके संघर्ष और पराजय के भिन्न विवरण हैं।

मिस्र में होरस को बाज़ अथवा बाज़मुखी देवता के रूप में चित्रित किया जाता था। सेत के साथ भी विभिन्न पशु-प्रतीक जुड़े थे। इन आकृतियों की तुलना भारतीय गरुड़ और नाग से की जा सकती है, लेकिन इनके अर्थ और कथाएँ अपनी-अपनी परंपराओं में अलग हैं।

यूनानी महाकाव्य इलियड में भी एक पक्षी के सर्प को लेकर उड़ने का प्रसंग मिलता है। लेख में इसे महाभारत में गरुड़ और नाग के संघर्ष की कथा के साथ रखकर देखा गया है। तिब्बती धार्मिक कला में भी पक्षी और सर्प के मिश्रित रूपों का उल्लेख मिलता है।

इन उदाहरणों को साथ देखने से यह स्पष्ट होता है कि पक्षी और सर्प के संघर्ष की कल्पना अनेक समाजों में मिलती है। लेकिन यह तय करने के लिए कि एक कथा दूसरी से ली गई थी या दोनों के पीछे कोई साझा परंपरा थी, हमें उनके कालक्रम, स्रोतों और संभावित संपर्कों की जाँच करनी होगी।

बैल की पूजा और मिश्रित जीवों के प्रतीक

बैल का धार्मिक महत्त्व भी अनेक प्राचीन सभ्यताओं में दिखाई देता है। मिस्र में अपिस बैल की पूजा होती थी। क्रीट की मिनोअन संस्कृति में भी बैल से संबंधित धार्मिक प्रतीकों का महत्त्व था। भारत में नंदी शिव के वाहन के रूप में प्रसिद्ध है।

बेबीलोनिया और पॉलिनेशिया से संबंधित कुछ कथाओं में पक्षी, सर्प और बैल के बीच संघर्ष के रूप मिलते हैं। मिस्र की कला में भी पशु-पक्षियों से जुड़े प्रतीकात्मक रूप दिखाई देते हैं। लेख में इन उदाहरणों की तुलना मेक्सिको की एक आकृति, यूनानी इलियड और भारतीय महाभारत के प्रसंगों से की गई है।

मिस्र के देवताओं में मानव और पशु के मिश्रित स्वरूप भी मिलते हैं। थॉथ को प्रायः इबिस पक्षी या उसके सिर वाले मानव रूप में, होरस को बाज़ के रूप में, अनुबिस को सियार के सिर वाले रूप में और बेस को विशिष्ट रक्षक आकृति में चित्रित किया जाता था। इन प्रतीकों की तुलना भारत की पशुमुखी और मिश्रित रूपों वाली धार्मिक आकृतियों से की जा सकती है।

इसी तरह, एलाम और मेसोपोटामिया की कला में सिंह, पक्षी, सर्प और अन्य जीवों के मिले-जुले रूप मिलते हैं। बेबीलोनिया के इश्तार द्वार पर बना मुश्हुश्शु नामक पौराणिक जीव इसका एक उदाहरण है। इन आकृतियों को केवल एक ही मूल से निकला हुआ मानने के बजाय उनके स्थानीय धार्मिक अर्थों और कलात्मक परंपराओं को समझना चाहिए।

सुअर: कहीं अपवित्र, कहीं महत्त्वपूर्ण धार्मिक प्रतीक

अब सुअर का उदाहरण लीजिए। मिस्र की कुछ धार्मिक कथाओं में सेत का संबंध काले सुअर से जोड़ा गया है। दूसरी ओर, सुअर से संबंधित प्रतीकों के अर्थ अलग-अलग धार्मिक संदर्भों में बदलते रहे। मिस्र में सुअर को कई संदर्भों में अपवित्र माना जाता था, जबकि यूरोप की कुछ प्राचीन संस्कृतियों में सुअर का सामाजिक और धार्मिक महत्त्व था।

भारत में भी एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। वराह विष्णु का एक अवतार है, जिसमें सूअर का रूप धारण करके पृथ्वी को बचाने की कथा मिलती है। वहीं, दैनिक सामाजिक व्यवहार में सुअर को कई जगह गंदगी से जोड़कर देखा जाता है।

यह उदाहरण बताता है कि किसी पशु का अर्थ हर समाज में एक जैसा नहीं होता। कोई जीव एक परंपरा में पूजनीय हो सकता है, दूसरी में अपवित्र और तीसरी में सामान्य जीवन का हिस्सा। किसी प्रतीक को समझने के लिए उस संस्कृति के अपने इतिहास और धार्मिक संदर्भ को जानना आवश्यक है।

निष्कर्ष: अपनी संस्कृति को समझिए, लेकिन उसे अलग-थलग मत मानिए

इन तमाम उदाहरणों पर गौर करने के बाद एक बात स्पष्ट होती है: दुनिया की प्राचीन संस्कृतियाँ एक-दूसरे से पूरी तरह कटी हुई नहीं थीं। व्यापार, प्रवास, राजनीतिक विस्तार और धार्मिक संपर्कों के माध्यम से विचारों और प्रतीकों का आदान-प्रदान होता रहा।

नाग, गरुड़, मत्स्य, बैल, ड्रैगन और पशु-पक्षियों के मिश्रित रूप अनेक संस्कृतियों में मिलते हैं। कहीं इनका संबंध जल से है, कहीं सृष्टि से, कहीं राजसत्ता से और कहीं मृत्यु तथा पुनर्जन्म से। इन समानताओं का अध्ययन हमें प्राचीन मानव समाजों की कल्पनाशक्ति और उनके आपसी संपर्कों को समझने में मदद करता है।

इसलिए अपनी संस्कृति, धर्म या नस्ल को दूसरों से स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ मानने की धारणा से बचना चाहिए। किसी संस्कृति का महत्त्व इस बात से कम नहीं हो जाता कि उसमें कुछ प्रतीक दूसरी संस्कृतियों में भी मिलते हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि उस संस्कृति ने उन प्रतीकों को किस प्रकार अपनाया, बदला और अपने जीवन का हिस्सा बनाया।

अतीत में झाँकने पर बहुत कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। लेकिन यह तय करना कि किसने किससे क्या लिया और किसी विचार का मूल कहाँ था, हमेशा आसान नहीं होता। इसके लिए प्रमाणों और ऐतिहासिक संदर्भों की जरूरत पड़ती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम समानताओं की पड़ताल करें, अपने निष्कर्षों को प्रमाणों के आधार पर परखें और किसी भी सभ्यता को बाकी दुनिया से पूरी तरह अलग या अनन्य मानकर न चलें।

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Written by
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Ashfaq Ahmad
Bilingual author, blogger, publisher, and cultural columnist with over 70 books in Hindi and English. Founder of Gradias Publishing House and chief editor of Aakharwani, specializing in crime thrillers, espionage, and sci-fi.

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